परीक्षा और डिग्री की होड़ में मूल उद्देश्य — मानव निर्माण — पीछे छूट गया है।

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🎓 विशेष रिपोर्ट

“वर्तमान शिक्षा प्रणाली — डिग्री नहीं, दिशा चाहिए”

🗞️ पत्रकार एवं विश्लेषक : करण सक्सेना


📍मुख्य बिंदु:

शिक्षा अब ज्ञान नहीं, प्रतिस्पर्धा का साधन बन गई है।

अंकों की दौड़ में नैतिकता और संवेदना खो गई है।

शिक्षक “गुरु” नहीं, कर्मचारी बनकर रह गए हैं।

डिजिटल युग ने संवाद घटाया, मशीनों पर निर्भरता बढ़ाई।

नई शिक्षा नीति ने उम्मीद जगाई, पर ज़मीन पर अब भी अधूरापन।

💬 विशेष टिप्पणी:

भारत की शिक्षा प्रणाली आज एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ विद्यार्थी किताबें तो पढ़ रहे हैं पर जीवन नहीं समझ रहे। परीक्षा और डिग्री की होड़ में मूल उद्देश्य — मानव निर्माण — पीछे छूट गया है।

अगर हमें सच्चे अर्थों में “विकसित भारत” बनाना है, तो शिक्षा को केवल रोज़गार का नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम बनाना होगा।

🕊️ अंकों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है विचारशीलता — और डिग्री से ज़्यादा मूल्यवान है मानवता।





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